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वर्ण विचार किसे कहते हैं: वर्ण के भेद, स्वर वर्ण, व्यंजन वर्ण, हिंदी मात्रा चिन्ह आदि

वर्ण विचार किसे कहते हैं (varn vichar kise kahate hain) | वर्ण किसे कहते हैं (varn kise kahate hain) | वर्णमाला किसे कहते हैं (varnamala kise kahate hain) | हिंदी वर्णमाला में वर्ण कितने होते हैं (varnamala me varn kitne hote hain) | वर्ण के कितने भेद या प्रकार होते हैं (varn ke kitne bhed ya prakar hote hain) | स्वर वर्ण किसे कहते हैं (swar varn kise kahate hain) | स्वर वर्ण के कितने भेद होते हैं (swar varn ke kitne bhed hote hain) | अनुनासिक और निरनुनासिक स्वर किसे कहते हैं? | अ की मात्रा वाले शब्द 50 | आ की मात्रा वाले शब्द | छोटी इ की मात्रा वाले शब्द | बड़ी ई की मात्रा वाले शब्द | उ की मात्रा वाले शब्द | ऊ की मात्रा वाले शब्द | ऋ की मात्रा वाले शब्द | ए और ऐ की मात्रा वाले शब्द | ओ और औ की मात्रा वाले शब्द | व्यंजन वर्ण किसे कहते हैं (vyanjan varn kise kahate hain) | व्यंजन वर्ण के कितने भेद होते हैं | क वर्ग से संबंधित शब्द | च वर्ग से संबंधित शब्द | ट वर्ग से संबंधित शब्द | त वर्ग से संबंधित शब्द | प वर्ग से संबंधित शब्द | य, र, ल, व वर्णों से संबंधित शब्द | श, ष, स, ह वर्णों से संबंधित शब्द | क्ष, त्र, ज्ञ, ड़, ढ़ वर्णों से संबंधित शब्द | हिंदी मात्रा चिन्ह (hindi matra chart) | अल्पप्राण और महाप्राण क्या है | घोष और अघोष व्यंजन | संयुक्त व्यंजन किसे कहते हैं | व्यंजन गुच्छ किसे कहते हैं | द्विगुण व्यंजन किसे कहते हैं | द्वित्व व्यंजन किसे कहते हैं | अयोगवाह किसे कहते हैं (ayogwah kise kahate hain) | वर्ण विक्षेपण किसे कहते हैं (varn vikshepan kise kahate hain)

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वर्ण विचार किसे कहते हैं (varn vichar kise kahate hain)

“हिंदी व्याकरण के उस भाग को वर्ण विचार कहते हैं, जिसमें वर्णों के उच्चारण, उनके स्वरूप, भेद और रचना का विश्लेषण किया जाता है। इसमें वर्णों की ध्वनि और उनके स्वर तथा व्यंजन में विभाजन पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यह भाषा के आधारभूत तत्वों को समझने का महत्वपूर्ण साधन है।”

वर्ण किसे कहते हैं (varn kise kahate hain)

भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि है। जो आवाज कान से सुनाई दे और उसका कुछ अर्थ हो, उसे ध्वनि कहते हैं। ध्वनि को अक्षर या वर्ण भी कहते हैं। वैसे वर्ण शब्द का प्रयोग ध्वनि तथा लिपि चिन्ह दोनों के लिए होता है। ध्वनिमूलक लिपि दो प्रकार की होती है – अक्षरात्मक एवं वर्णनात्मक। सही उच्चारण तथा सही लेखन के लिए वर्णों का विशेष महत्व है।

अथवा

बोलते एवं बातचीत करते समय हमारे मुख से अनेक ध्वनियां निकलती है। प्रत्येक शब्द में कई ध्वनियां होती है। इन ध्वनियों के टुकड़े नहीं किया जा सकते; जैसे ― फूल को देखो।

जैसा कि आप देख सकते हैं उपर्युक्त वाक्य में तीन शब्द लिखा गया है और प्रत्येक शब्द में कई ध्वनियां हैं। अब इनको अलग करके देखते हैं –

फूल → फ् + ऊ + ल् + अ

को → क् + ओ

देखो → द् + ए + ख् + ओ

प्रत्येक शब्द के सामने लिखी सभी ऐसी ध्वनियां हैं जिनके अब और टुकड़े नहीं हो सकते। अतः वह छोटी-से-छोटी ध्वनि जिसके और टुकड़े ना हो सके, वर्ण कहलाती है।

वर्णमाला किसे कहते हैं (varnamala kise kahate hain)

वर्णों के क्रमबद्ध स्वरूप को वर्णमाला कहते हैं।

अथवा

किसी भी भाषा के सभी वर्णों के समहू को वर्णमाला कहते हैं।

हिंदी वर्णमाला में वर्ण कितने होते हैं (varnamala me varn kitne hote hain)

हिंदी वर्णमाला के 52 अक्षर या वर्ण होते हैं। जिनको हम आगे विस्तार से देखने वाले हैं, ये कौन-कौन होते हैं और इनसे शब्दों का निर्माण भी करेंगे।

वर्ण के कितने भेद या प्रकार होते हैं (varn ke kitne bhed ya prakar hote hain)

देवनागरी या हिंदी वर्णमाला के मुख्यतः दो भेद या प्रकार होते हैं ― स्वर और व्यंजन। अब आगे जानते हैं ―

स्वर वर्ण किसे कहते हैं (swar varn kise kahate hain)

जो वर्ण किसी अन्य वर्ण की सहायता के बिना बोले जाते हैं, उन्हें स्वर कहते हैं। इन्हें बोलते समय मुंह के अंदर की वायु बिना किसी रुकावट के बाहर निकलती है। 

अथवा

जिन वर्णों का उच्चारण बिना किसी अवरोध के होता है, स्वर वर्ण कहलाते हैं। ऐसे वर्णों का उच्चारण अन्य किसी वर्ण के सहयोग के बिना ही होता है परंतु व्यंजन वर्णों के उच्चारण में स्वर वर्ण सहायक होते हैं। हिंदी वर्णमाला में 11 स्वर होते हैं।

नीचे चित्र - 1. में 11 स्वर, मात्रा के साथ दिया गया है ―

मात्रा के साथ 11 स्वर | 11 swar matra ke sath
चित्र - 1.

नोट* ― (1) अं (अनुस्वार), अँ (अनुनासिक), अः (विसर्ग) इन तीनों को भी स्वर वर्ण के साथ लिखा हुआ देखा जाता है, लेकिन इनको अयोगवाह के अंतर्गत रखा गया है और इनकी मात्राएं इस प्रकार लिखते हैं ― अं (ं), अँ (ँ), अः (ः) |

(2) हिंदी में उच्चारण की दृष्टि से स्वर नहीं है परंतु लेखन के विचार से स्वर माना जाता है यह ‘रि’ के समान उच्चरित होने के कारण उच्चारण में स्वर मान्य नहीं है। यह संस्कृत में स्वर माना जाता है परंतु हिंदी में एक सीमा तक ही मान्य है। जैसे – ऋग्वेद, ऋषि, ऋतंभरा, ऋतुराज आदि।

(3) , और जैसे वर्ण हिंदी वर्णमाला के मूल या पारंपरिक अक्षरों का हिस्सा नहीं हैं। इन्हें गृहीत वर्ण (adopted letters) कहा जाता है, जो हिंदी में अन्य भाषाओं (जैसे उर्दू, फ़ारसी, अंग्रेज़ी) से लिए गए हैं। फ पर नुक्ता (़) लगाने से 'फ़' बनता है।

स्वर वर्ण के कितने भेद होते हैं (swar varn ke kitne bhed hote hain)

मात्रा के अनुसार देखें तो स्वर दो (2) प्रकार के हैं ― ह्रस्व स्वर तथा दीर्घ स्वर।

(क) ह्रस्व स्वर – जिन स्वर के उच्चारण में ज्यादा समय नहीं लगता है, उसे ह्रस्व स्वर कहते हैं।

'अथवा'

जिन स्वरों को बोलने में देर नहीं लगता जिनका हम तुरंत उच्चारण कर सकते हैं, ह्रस्व स्वर कहलाता है। ये चार "अ, इ, उ, ऋ" ह्रस्व स्वर हैं।

(ख) दीर्घ स्वर – जिस स्वर के उच्चारण में समय अधिक लगता है, उसे दीर्घ स्वर कहते हैं।

"अथवा"

जिन स्वरों को बोलने में देर लगता है, दीर्घ स्वर कहते हैं और इन्हें दो मात्राओं का स्वर भी कहा जाता है। ये सात दीर्घ स्वर हैं ― आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ। 

नोट* - (1) कुछ लोग ए, ऐ, ओ, औ को संयुक्त स्वर मानते हैं। इनका उच्चारण व्यंजन वर्ण अथवा के साथ होता है। इनके उच्चारण में दो स्वर मिलते हैं। जैसे – ए (अ + ई), ओ (अ + उ) आदि।

(2) अंग्रेजी के डॉक्टर, कॉलेज, वॉल आदि शब्दों में ए तथा तो ध्वनियों के बीच दीर्घ स्वरों का उच्चारण होता है। दीर्घ स्वर से विभिन्न लिखने के कारण इनका अलग प्रचलन हो गया है।

अनुनासिक और निरनुनासिक स्वर किसे कहते हैं?

सभी स्वरों के उच्चारण दो प्रकार से होते हैं। केवल मुख से तथा मुख और नाक से मिलकर। केवल मुख से उच्चारित स्वर निरनुनासिक स्वर कहलाते हैं। जैसे – अपना, इधर, ऊपर आदि । और जिन स्वर का मुख तथा नाक दोनों से उच्चारण होता है, उसे अनुनासिक स्वर कहते हैं। जैसे – आँख, आँचल, बाँझ, साँप आदि।

अ की मात्रा वाले शब्द 50

अ का मात्रा कैसे प्रयोग किया जाता है दिखिये, जैसे ― जब हम ‘क्’ में ‘’ की मात्रा जोड़ते हैं तो यह ‘’ बनता है इसी प्रकार से आगे हमने अ की मात्रा वाले 50 शब्द लिख दिया है –

(1) मतलब | (2) अमरूद | (3) टमटम | (4) थरमस | (5) समतल | (6) नमक | (7) तहत | (8) तरफ | (9) तरह | (10) अनार | (11) अचार | (12) अदरक | (13) अमर | (14) अलग | (15) असर (16) समय | (17) नगर | (18) सरल | (19) जनता | (20) कसर (21) अजय | (22) अटल | (23) समय | (24) अभय | (25) अक्षर | (26) लखन | (27) गगन | (28) टहल | (29) चमक | (30) वन | (31) फल | (32) कल | (33) चल | (34) अब | (35) तक | (36) सब | (37) पर | (38) हर | (39) घर | (40) डर | (41) मर | (42) मत | (43) यह | (44) वह | (45) छत | (46) जल | (47) थल | (48) मन | (49) सन | (50) जन |

आ की मात्रा वाले शब्द

आ की मात्रा ये है - (ा)। हम किसी भी वर्ण के साथ आ की मात्रा लगाकर शब्द बना सकते हैं, जैसे ― ‘क्’ में अगर आ (ा) की मात्र जोड़े तो ‘का’ हो जाता है। आई अब हम आ की मात्रा से बनने वाले शब्दों को देखते हैं –

आम | मात्रा | पाना | ताल | जाल | बाल | साल | पाल | चार | हार | रात | साथ | आठ | माल | काल | राम | जान | खान | पान | दान | कान | नाक | हाथ | बात | काम | दाम | नाम | शाम | जाम | भाव | आना | जाना आदि।

छोटी इ की मात्रा वाले शब्द

छोटी इ की मात्रा (ि) ― अगर हम ‘क्’ में छोटी इ की मात्रा लगाएं तो ‘कि’ में बदल जाता है। अब हम छोटी इ की मात्रा से कुछ शब्द लिखते हैं –

चित्र | मिल | दिल | झिल | हिल | खिल | बिना | दिन | सिर | लिख | दिया | पिता | विषय | विधि | विधान | बिल | विवाह | विवरण | दिशा | जिन | शिक्षक | गणित आदि।

बड़ी ई की मात्रा वाले शब्द

‘क्’ में बड़ी ई की मात्रा (ी) लगाने पर ‘की’ बनता है। नीचे आप बड़ी ई की मात्रा वाले कुछ शब्द देख सकते हैं — 

तीन | तीर | खीर | नीर | धीर | वीर | ठीक | बीच | सीता | गीता | हीन | हीरो | कीमत | जीवन | जीत | दीर्घ | टीन | टीम | तीस | तीज | टीवी | शीत आदि।

उ की मात्रा वाले शब्द

छोटी उ की मात्रा हम लोग इस तरह से लिखते हैं ‘ु’ जैसे - ‘क्’ में उ की मात्रा ‘कु’। इस मात्रा से लिखे जाने वाले शब्द ―

गुड़, बुधवार, बुलाया, गुड़िया, बुलबुल, कुमार, कुत्ता, कुल, कुश, खुश, खुद, खुराक, खुल, धुन, सुन, गुण, गुत्थी, शुभ आदि।

ऊ की मात्रा वाले शब्द

बड़ी ऊ की मात्रा को इस तरह से लिखा जाता है - ू। जैसे - क् + ू = कू होगा। इस मात्रा से जुड़े शब्दों को नीचे लिखा गया है ―

धूप, धूल, झूल, शूल, भूल, झूठ, झूला, कूद, कूपन, कूड़ा, बूढ़ा, खूब, खून, सूचना, सूत्र, फूल, दूध, गूगल आदि।

ऋ की मात्रा वाले शब्द

इसे ही ऋ की मात्रा कहा जाता है, क् + ऋ = कृ। इस मंत्र का प्रयोग ज्यादातर संस्कृत में किया जाता है। ऋ की मात्रा के शब्द इस प्रकार हैं ―

कृपा | कृति | गृह | वृक्ष | मृत | पृथ्वी | ऋतु | तृष्णा | कृपया | घृणा | तृप्ति | कृषि | ऋषि | सृष्टि | कृष्ण आदि।

नोट* ― र् , त्र् , श्र् इन तीन वर्णों के साथ 'ऋ' की मात्रा का प्रयोग नहीं होता है।

ए और ऐ की मात्रा वाले शब्द

ए की मात्रा (े) – क् + ए = के और ऐ की मात्रा (ै) – क् + ऐ = कै लिखा जाएगा। ए और ऐ की मात्रा वाले शब्द नीचे पढ़िए ―

👉🏾 सेब, केला, भेड़, पेड़, खेत, खेल, केवल, देश, वेश, वेतन, सेना, सेवा, शेष, शेख, पेज, पेट, पेश, फेसबुक, बेहद, बेटी, मेहनत, सेहत, जेल, मेल, तेल, लेकिन आदि।

👉🏾 ऐनक, थैला, मैला, बैठ, पैर, बैल, नैना, पैसा, वैसा, कैसा, तैसा, वैद्य, पैदल, जैव, बैग, भैस, दैत्य, दैनिक, कैमरा, गैस, घैला, चैत्र, जैसा, टैक्स, तैयार, नैतिक, फैसला, भैरव आदि।

ओ और औ की मात्रा वाले शब्द

ो - ये ओ की मात्रा है, क् + ओ की मात्रा = को। ौ - ये औ की मात्रा है, क् + औ की मात्रा = कौ। इन मात्राओं वाले शब्दों को नीचे देख सकते हैं ―

👉🏾 ओखली, ओम, ओठ, ओल, ओस, कोशिश, खोल, बोल, तोल, गोल, मोल, झोल, होस्टल, होटल, खोना, धोखा, धोना, नोटिस, पोस्ट, भोजन, मोहन, योजना, योगदान आदि।

👉🏾 औरत, दौड़, औजार, औषधि, कौशल, खौफ, गौरव, गौतम, चौक, तौलिया, तौबा, दौरा, नौकरी, नौकर, नौसेना, पौधा, फौज, बौछार, बौद्ध, भौतिक, मौसम, रौशनी, रौनक, लौटा, शौच, सौभाग्य, हौसला आदि।

② व्यंजन वर्ण किसे कहते हैं (vyanjan varn kise kahate hain)

जिन वर्णों का उच्चारण स्वरों की सहायता से होता है, वे व्यंजन वर्ण कहलाते हैं। प्रत्येक व्यंजन के उच्चारण में ‘अ’ स्वर दिया रहता है। जैसे - क = क् + अ। व्यंजन ध्वनि के उच्चारण में भीतर से आती हवा किसी न किसी रूप में मुख में बाधित होती है।

अथवा

जो वर्ण स्वरों की सहायता से बोले जाते हैं, उन्हें व्यंजन कहते हैं। इन्हें बोलते समय मुंह के अंदर की वायु थोड़ी रुकावट के साथ बाहर निकलती है। हिंदी वर्णमाला में व्यंजन वर्णों की संख्या 33 हैं।

व्यंजन वर्ण के कितने भेद होते हैं

व्यंजन वर्ण के तीन भेद होते हैं ― (1) स्पर्श व्यंजन (2) अन्तःस्थ व्यंजन तथा (3) ऊष्म व्यंजन।

1) स्पर्श व्यंजन — जिन वर्णों को बोलते समय जीभ मुँह के विभिन्न भागों को स्पर्श करती हुई बाहर आती है, उन्हें स्पर्श व्यंजन कहते हैं। इनकी कुल संख्या = 5 × 5 = 25 होती है।

अथवा

स्पर्श व्यंजन कंठ, तालु, मूर्द्धा, दन्त और ओष्ठ स्थानों के स्पर्श से बोले जाते हैं। उच्चारण के लिए ये अलग-अलग वर्गों में विभक्त हैं। अतः इन्हें वर्गीय व्यंजन भी कहते हैं। उदाहरण –

स्पर्श कंठ्य (कंठ) (कवर्ग)
स्पर्श तालव्य (तालु) (चवर्ग)
स्पर्श मूर्धन्य (मूर्द्धा) (टवर्ग)
स्पर्श दन्त (दाँत) (तवर्ग)
स्पर्श ओष्ठ (ओंठ) (पवर्ग)

ध्यान रखें ― (i) ड़ और ढ़ को मूर्धन्य (ट वर्ग) में रखा जाता है। यह स्पर्श व्यंजन की श्रेणी में आते हैं क्योंकि उच्चारण के समय जीभ तालू या मूर्धा को स्पर्श करती है। संस्कृत में ये अक्षर नहीं पाए जाते, लेकिन आधुनिक हिंदी में इनका उपयोग होता है। जैसे - पेड़, मेढ़क।

(ii) हलचिन्ह:- सभी व्यंजन वर्णों में ‘अ’ स्वर रहता है। जैसे - ख में ख्+अ ध्वनि है। जब बिना स्वर के व्यंजन का प्रयोग करना होता है तो उनके नीचे हल चिन्ह लगा दिया जाता है। क्, ख्, फ्, ल्, र् ये हल चिन्ह के साथ लिखा गया है।

2) अन्तःस्थ व्यंजन — चार वर्ण अर्थात य, र, ल, व का उच्चारण जीभ, तालु और ओठ के परस्पर सटने से (कहीं भी पूर्ण सटने से नहीं) होता है। इन्हें अन्तःस्थ व्यंजन कहते हैं।

अथवा

अन्तःस्थ का अर्थ है – मध्य में। जिन व्यंजनों के उच्चारण में जीभ मुंह के अंदर के भागों को बहुत थोड़ा-सा स्पर्श करती है, उन्हें अंतःस्थ व्यंजन कहते हैं।

3) ऊष्म व्यंजन — चार व्यंजन वर्ण अर्थात श, ष, स, ह का उच्चारण एक प्रकार की रगड़ या घर्षण से उत्पन्न ऊष्म हवा से होता है।

अथवा

ऊष्म का अर्थ है – गरम। जिन व्यंजनों के उच्चारण में वायु मुँह के विभिन्न भागों से रगड़ खाती हुई बाहर आती है और गर्मी पैदा होती है, उन्हें ऊष्म व्यंजन कहते हैं।

क वर्ग से संबंधित शब्द

क वर्ण कबूतर, कलश, कटहल, कछुआ, कठफोड़वा, कमर, कमीज, ककड़ी, करछुल, किसान, कोयल, कड़ाही आदि।
ख वर्ण खटमल, खपड़ा, खजूर, खेल, खीर, खीरा, खाट, खेत, खाना, खिलाड़ी, खिलोना आदि।
ग वर्ण गाय, गमला, गधा, गरम, गांव, गोंद, गिलास, गोबर, गुड़िया, गन्ना, गेहूँ, गेंद, गाड़ी आदि।
घ वर्ण घर, घोड़ा, घोसला, घास, घटना, घुटना, घाव, घेरा, घंटी, घड़ी, घुंगरू आदि।
ङ वर्ण गंगा, कंघा, जंघा, दंगा, रंग, भंग, दंग, पंकज, पंख आदि।

च वर्ग से संबंधित शब्द

च वर्ण चरखा, चना, चप्पल, चम्मच, चक्का, चावल, चारपाई, चेहरा, चादर, चूल्हा, चाभी, चमेली आदि।
छ वर्ण छत, छतरी, छलनी, छड़, छाती, छिपकली, छुरी आदि।
ज वर्ण जहाज, जग, जलेबी, जल, जाल, जमुना, जेब, जूता, जादूगर, जोंक, जूँ आदि।
झ वर्ण झरना, झंडा, झंझरी, झाड़ू, झूला, झूमर, झोला, झाड़ी, झील, झींगुर आदि।
ञ वर्ण चंचल, पंचम, पंजा, गंज, अंचल, झंझट आदि।

ट वर्ग से संबंधित शब्द

ट वर्ण टमाटर, टब, टमटम, टकी, टोपी, टोकरी, टीका, टिन, टैटू आदि।
ठ वर्ण ठठेरा, ठग, ठप्पा, ठेप, ठोढ़ी, ठेला, ठंडा, ठनका, ठीक आदि।
ड वर्ण डमरू, डलिया, डर, डफली, डिब्बा, डेस्क, डॉक्टर, डाली आदि।
ढ वर्ण ढलान, ढक्कन, ढकना, ढोलक, ढिबरी, ढीला, ढाक, ढेकी आदि।
ण वर्ण रण, क्षण, भीषण, रावण, भाषण, भण्डार, ठण्डा आदि.

त वर्ग से संबंधित शब्द

त वर्ण तबला, तरबूज, तकिया, तसला, तरकारी, तलवार, तीर, तार, ताला, तेल, तेंदुआ, तितली, तीतर, तबियत आदि।
थ वर्ण थरमस, थन, थरमामीटर, थाली, थूक, थोड़ा, थैला आदि।
द वर्ण दवात, दलिया, दाल, दूध, दाँत, दाढ़ी, दीमक, दीपक, दुकानदार, दरी आदि।
ध वर्ण ध्यान, धनिया, धर्म, धन, धान, धोबी, धागा, धावक, धनुष आदि.
न वर्ण नल, नथ, नमक, नाव, नगाड़ा, नाखून, नेवला, नारंगी, नींबू, नाक आदि।

प वर्ग से संबंधित शब्द

प वर्ण पपीता, पगड़ी, पजामा, पलंग, पंख, पंखा, पुल, पैर, पान, पौधा, पत्ता आदि।
फ वर्ण फल, फन, फसल, फरसा, फावड़ा, फीता, फूल, फोन आदि।
ब वर्ण बस, बल्ला, बतख, बन्दर, बरगद, बगुला, बस्ता, बगीचा, बांसुरी, बिच्छू, बुलबुल, बिस्कुट, बीज, बकरी आदि।
भ वर्ण भगवान, भवन, भगत, भजन, भरत, भारत, भेड़, भालू, भिंडी, भारी, भूसा आदि।
म वर्ण मटर, मछली, मचिया, मगरमच्छ, मकई, मचान, मैना, मड़आ, मक्खन, माला, मिर्च, मकड़ी, मक्खी आदि.

य, र, ल, व वर्णों से संबंधित शब्द

य वर्ण यज्ञ, योद्धा, यकीन, याद, यान, योग आदि।
र वर्ण रथ, रबड़ी, रबर, रसगुल्ला, रस्सी, रसोई, राजा, रुमाल, रूई, रिक्शा, रोटी, रायता, रेलगाड़ी, रुपया, राखी आदि।
ल वर्ण लहसुन, लड्डू, लहर, लड़का, लड़की, लोटा, लोमड़ी, लीची, लौकी, लालची आदि।
व वर्ण वजन, वन, वट, वक, वर, वरदान, वर्दी, वकील, वस्तु, वायु, वस्त्र आदि।

श, ष, स, ह वर्णों से संबंधित शब्द

श वर्ण शलजम, शहर, शहद, शरबत, शकरकंद, शरीफ, शून्य, शाम, शायद, शहनाई, शिक्षक, शंख, शेर आदि।
ष वर्ण षटकोण, धनुष, भाषा, षड्यंत्र आदि।
स वर्ण सड़क, सफर, सपेरा, सखुआ, सब्जी, सनई, सुराही, सुई, साबुन, सरसों, सेब, सीटी आदि।
ह वर्ण हल, हिरण, हाथ, हल्दी, हथौड़ा, हड्डी, हरा, हीरो, हंस, हाथी, हीरा हार आदि।

क्ष, त्र, ज्ञ, ड़, ढ़ वर्णों से संबंधित शब्द

क्ष वर्ण क्षमा, क्षय, क्षत्रिय, यक्ष, अक्षय, अक्षर आदि।
त्र वर्ण मंत्र, यंत्र, तंत्र, त्रिकोण, त्रिशूल, त्राहि, पत्र, पवित्र, चित्र आदि।
ज्ञ वर्ण ज्ञान, ज्ञानी, ज्ञाता, आज्ञा आदि।
ड़ वर्ण घोड़ा, ताड़ का पेड़, पहाड़, कपड़ा, पेड़ा, सड़क, गड़बड़, लकड़ी, लकड़ी, भेड़, घड़ा, दौड़, लड़ना, सड़ना आदि।
ढ़ वर्ण बढ़त, बढ़ाई, दाढ़ी, पढ़ना, मेढ़क आदि।

हिंदी मात्रा चिन्ह (hindi matra chart)

चित्र - 2. में आप हिंदी मात्रा चिन्ह को एक चार्ट में देख सकते हैं —

हिंदी मात्रा चिन्ह (hindi matra chart)
चित्र - 2.

अल्पप्राण और महाप्राण क्या है

उच्चारण में वायु प्रवाह की दृष्टि से व्यंजनों के दो भेद हैं— अल्प प्राण और महाप्राण। जिन व्यंजन वर्णों के उच्चारण में थोड़ा परिश्रम करना पड़ता है और जिनमें ‘हकार’ नहीं होती, उन्हें अल्प प्राण व्यंजन तथा जिन वर्णों में हकार जैसी ध्वनि निकलती है उन्हें महाप्राण व्यंजन कहते हैं। प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा और पांचवा वर्ण अल्पप्राण तथा दूसरा और चौथा वर्ण व समस्त ऊष्म वर्ण महाप्राण है।

वर्ग अल्पप्राण महाप्राण
कवर्ग क, ग, ङ ख, घ
चवर्ग च, ज, ञ छ, झ
टवर्ग ट, ड, ण ठ, ढ
तवर्ग त, द, न थ, ध
पवर्ग प, ब, म फ, भ
ऊष्म
श, ष, स, ह

घोष और अघोष व्यंजन

जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वर तंत्रियों का कंपन नहीं होता उनको अघोष वर्ण कहते हैं। जैसे– क, ख, च, छ, ट, ठ, त, थ, प, फ, श, ष, स।

जिन ध्वनियों के उच्चारण में स्वर तंत्रियों का कंपन होता है, उन्हें घोष वर्ण कहते हैं। प्रत्येक वर्ण का तीसरा, चौथा और पांचवा वर्ण सारे स्वर वर्ण, य, ल, व और ह।

संयुक्त व्यंजन किसे कहते हैं

जो व्यंजन दो व्यंजनों के मेल से बनते हैं, उन्हें संयुक्त व्यंजन कहते हैं। जैसे –

(i) क्ष → क् + ष

(ii) त्र → त् + र

(iii) ज्ञ → ज् + ञ

(iv) श्र → श् + र

संयुक्त व्यंजन के 20+ शब्द

  • क्ष — पक्ष | दक्ष | क्षमा | कक्षा | क्षत्रिय।
  • त्र — पत्र | छत्र | सत्र | शत्रु | मित्र | त्रिशूल।
  • ज्ञ — ज्ञानी | ज्ञान | यज्ञ | विज्ञान | प्रज्ञा | जिज्ञासा।
  • श्र — श्रुति | श्रवण | श्रद्धा | श्रीमान | परिश्रम।

व्यंजन गुच्छ किसे कहते हैं

जब दो या दो से अधिक व्यंजन एक साथ एक ही सांस के प्रवाह में बोले जाते हैं या 2-3 व्यंजन बिना स्वर के लगातार आए, तो उन्हें व्यंजन गुच्छ कहते हैं। व्यंजन गुच्छ दो प्रकार के मिलते हैं ―

(क) व्यंजन + य, र, ल, व ।

(ख) स् + य, र, ल, व से भिन्न व्यंजन ।

जैसे – 

1) ⇒ क् + य, र, ल, व = क्यारी, क्वारा, क्रम, क्लेश ।

ग् + य, र, ल, व = ग्यारह, ग्राम, ग्वाल, ग्लानि ।

 2) ⇒ स् + व्यंजन = स्त्रोत, स्नान, स्तन, स्फूर्ति, स्पष्ट, स्लेट, स्मारक, स्टेशन आदि।

नोट* - व्यंजन गुच्छ = बिना स्वर वाले व्यंजनों का झुंड।

द्विगुण व्यंजन किसे कहते हैं

हिंदी के शब्दों में आपने कभी न कभी इन दो अक्षरों को जरूर देखा होगा - ड़ और ढ़। इन दोनों अक्षरों को ही द्विगुण व्यंजन कहा जाता है। इनको लिखने के लिए हम ‘ड’ और ‘ढ’ के नीचे एक बिंदु लगाते हैं और इस बिंदु (़) को नुक्ता कहते हैं। संस्कृत में इनका प्रयोग नहीं किया जाता है। आप निचे इनके कुछ उदाहरण देख सकते हैं― 

★ शब्दों के बीच में → गढ़ना, झड़ना, बढ़िया, तड़का, लपड़ आदि ।

★ शब्दों के अंत में → चढ़, लड़, आषाढ़, पढ़, पेड़ आदि ।

द्वित्व व्यंजन किसे कहते हैं

एक व्यंजन का अपने समरूप व्यंजन से मिलना द्वित्व कहलाता है। जैसे – पक्का, बच्चा, लड्डू आदि।

र व्यंजन युक्त गुच्छ तथा संयोग —

1. जब 'र' (स्वर रहित) किसी व्यंजन के पूर्व आये - कर्म, धर्म, वर्ष आदि है।

2. जब र (स्वर सहित) किसी व्यंजन के बाद हो - प्रेम, क्रम, स्रोत आदि।

3. जर र (स्वर सहित) ट ओर ड के साथ वर्तनी में कुछ भिन्न रूप ले - ट्रेन, ड्रामा, ट्राली, ड्रम आदि।

4. जब र (स्वर सहित) त और श के साथ जुड़ता है तो विशेष रूप ग्रहण करता है-

त् + र = त्र = त्रिभुज, त्रिशूल, त्रिगुण ।

श् + र = श्र = श्रम, श्री, श्रमिक ।

अयोगवाह किसे कहते हैं (Ayogwah Kise Kahate Hain)

अनुस्वार (ं), अनुनासिक (ँ) और विसर्ग (ः) ये तीनों को ही अयोगवाह कहा जाता है। ये न तो स्वर होते हैं और न ही व्यंजन, लेकिन फिर भी इन्हें स्वर के साथ क्रमशः लिखा जाता है। अं, अँ और अः ये तीनों ही ‘अयोगवाह’ कहलाता है।

(क) अनुस्वार (ं) – यह स्वर के बाद आने वाला व्यंजन है। इसकी ध्वनि नाक से निकलती है। जैसे - रंग, ढंग, कंपन, चंदन, अंगूर, अंग आदि। अनुनासिक (ँ) स्वर और अनुस्वार (ं) में चिन्हों के अतिरिक्त अंतर है कि अनुनासिक स्वर, स्वर है जबकि अनुस्वार व्यंजन है। इनके प्रयोग की दृष्टि से कुछ शब्दों में अर्थ का अंतर आ जाता है। जैसे - अनुस्वार ‘हंस’ तथा अनुनासिक ‘हँस’ (ना) में।

"अथवा"

जब किसी वर्ण को बोलते समय वायु केवल नाक से बाहर आती है, तो लिखते समय उस वर्ण के ऊपर अनुस्वार बिंदु (ं) लगाया जाता है।

(ख) अनुनासिक (ँ) – जब किसी वर्ण का उच्चारण करते समय वायु मुँह और नाक दोनों से एक साथ बाहर निकलती है, तो लिखते समय उस वर्ण के ऊपर चंद्रबिंदु (ँ) लगाया जाता है। अनुनासिक चिन्ह को चंद्रबिंदु भी कहते हैं; जैसे – चाँद, गाँव, आँगन, काँच आदि।

(ग) विसर्ग (ः) – यह व्यंजन ध्वनि है। इसका उच्चारण ‘ह’ की तरह होता है जो स्वर के बाद आता है। हिंदी में इसका प्रचलन कम होता जा रहा है। अतः, स्वतः, प्रातःकाल, दुःख, पुनः, प्रायः आदि इसके उदाहरण हैं। अनुस्वार और विसर्ग न तो स्वर हैं न व्यंजन। ये स्वरों के सहारे चलते हैं। दोनों में इनका उपयोग होता है।

वर्ण विक्षेपण किसे कहते हैं (varn vikshepan kise kahate hain)

शब्दों या वाक्यों के वर्णों (अक्षरों) के स्थान या क्रम को बदलने की प्रक्रिया को वर्ण विक्षेपण कहते हैं। यह परिवर्तन जानबूझकर या अनजाने में हो सकता है और इसका उपयोग मुख्यतः साहित्यिक सौंदर्य बढ़ाने, शब्द खेल या काव्य रचना में किया जाता है। उदाहरण के लिए, 'राम' का वर्ण विक्षेपण 'मार' हो सकता है।

इस पेज में वर्ण विचार (varn vichar) पर काफी विस्तार से जानकारी दिया गया है। तो कृपया इसे ध्यान देकर पढ़िए, ताकि परीक्षा में इस अध्याय से आने वाले एक भी प्रश्न छूट न पाए। वर्ण का उच्चारण और वर्तनी किसे कहते हैं, आगे आने वाले लेख में बताने वाले हैं। तो कृपया हमारे ब्लॉग वेबसाइट https://hindigrammarhindi.blogspot.com/ पर अगले लेख को पढ़ने के लिए बने रहिए। अपने मित्रों और सहपाठियों के साथ इसे शेयर जरूर करें।

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